कुरुक्षेत्र की जमीन पर सियासी उथल पुथल से तय होगा आम चुनाव

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विनोद अग्निहोत्री, अमर उजाला, नई दिल्ली Updated Wed, 25 Jul 2018 03:48 PM IST


संसद के भीतर विपक्ष गरम है और बाहर सड़कों पर जनता। विपक्ष सरकार की विफलताओं और राफेल सौदे को लेकर माहौल गरमा रहा है तो सरकार और भाजपा अपनी उपलब्धियों के साथ साथ हिंदुत्व की धार को लेकर सियासी तापमान चढ़ाने में जुटी है। संसद में अविश्वास प्रस्ताव में मिली जीत को अगर अपने पक्ष में माहौल बनाने में सरकार और भाजपा कामयाब हो जाती है तो प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी आम चुनावों को लेकर देश को चौंका सकते हैं और अगर सियासी तापमान माकूल नहीं लगा तो चुनावों का टाइम टेबल जैसा है वैसा ही रहेगा।


लोकसभा में विपक्ष के अविश्वास प्रस्ताव के दौरान राहुल गांधी के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को गले लगाने से लेकर अपने किसी सहयोगी सांसद को आंख मारकर इशारा करने को लेकर भाजपा और उसके समर्थकों ने कांग्रेस पर जितना जोरदार हमला किया और खुद प्रधानमंत्री ने अगले दिन उत्तर प्रदेश में अपनी एक जनसभा में कहा कि राहुल तो उनके गले पड़ गए, उसके आधे तेवर भी अगर सरकार ने अलवर में कथित गौ रक्षकों की भीड़ हिंसा से मारे गए रकबर की मौत को लेकर दिखाए होते तो निश्चित रूप से संसद के बाद देश की अमन पसंद जनता का विश्वास भी सरकार के प्रति और मजबूत हो जाता। लेकिन हर बार की तरह इस बार भी भीड़ हिंसा से निपटने की सारी जिम्मेदारी राज्य सरकारों पर छोड़कर सरकार आगे बढ़ना चाहती थी, लेकिन संसद में विपक्ष के दबाव के बाद सरकार ने उच्च स्तरीय समिति गठित करते हुए इस मामले में कानून बनाने की दिशा में कदम बढ़ा दिए।


2015 में जब उत्तर प्रदेश के दादरी में इसी तरह उन्मादी भीड़ ने कथित गोहत्या के विरोध में इकलाख की हत्या की थी, तो देश में एक बड़ा सियासी बवंडर खड़ा हो गया था। जहां सारे विपक्षी दल इसे लेकर भाजपा और संघ परिवार को कठघरे में खड़ा कर रहे थे, वहीं केंद्र सरकार इसे प्रदेश की तत्कालीन सपा सरकार की नाकामी बताकर गौ रक्षा के अपने एजेंडे को आगे बढ़ाते हुए हिंदुत्व की धार तेज करने में जुट गई थी।



याद होगा कि बिहार विधानसभा चुनाव तक में दादरी कांड को लेकर भाजपा नेताओं और गिरिराज सिंह जैसे केंद्रीय मंत्रियों ने हिंदुत्व की धार पर हिंदुओं के ध्रुवीकरण की पुरजोर कोशिश की, लेकिन लालू नीतीश के तत्कालीन सामाजिक समीकरण ने उसे सिरे नहीं चढ़ने दिया।


दादरी कांड के बाद भीड़ हिंसा की न जाने कितनी घटनाएं देश में हो चुकी हैं और शायद ही कोई राज्य इस तरह की हिंसा से अछूता हो। अकेले अलवर के मेवात इलाके में ही एसी चार घटनाएं हुईं। इसके अलावा झारखंड, महाराष्ट्र, कर्नाटक, गुजरात, उत्तर प्रदेश और पूर्वोत्तर में कहीं गाय को लेकर तो कहीं बच्चा चोरी के शक में भीड़ ने संदिग्धों की पीट पीट कर मार डाला या अधमरा कर दिया।



ऐसे मामलों में ज्यादार जगहों पर पुलिस की भूमिका पर भी सवाल उठे। मामला सर्वोच्च न्यायालय तक पहुंचा और अदालत ने भी इसे बेहद गंभीर मानते हुए राज्य सरकारों को एसी घटनाएं रोकने और केंद्र सरकार से भीड़ हिंसा को लेकर सख्त कानून बनाने को कहा। इसके बावजूद जिस तरह की सरकारी चुप्पी और लीपापोती भीड़ हिंसा को लेकर दिखाई देती है, और जिस तरह केंद्रीय मंत्रियों से लेकर संघ और भाजपा नेताओं के गैर जिम्मेदार बयान आए हैं, उससे साफ जाहिर है कि इन घटनाओं को लेकर सियासी और सामाजिक ध्रुवीकरण की राजनीति भी तेज होती जा रही है।



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