लिपि किसे कहते है ?

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लिपि -शब्द का अर्थ है-‘लीपना’ या ‘पोतना’ विचारो का लीपना अथवा लिखना ही लिपि कहलाता है।
दूसरे शब्दों में- भाषा की उच्चरित/मौखिक ध्वनियों को लिखित रूप में अभिव्यक्त करने के लिए निश्चित किए गए चिह्नों या वर्णों की व्यवस्था को लिपि कहते हैं।

हिंदी और संस्कृत भाषा की लिपि देवनागरी है। अंग्रेजी भाषा की लिपि रोमन पंजाबी भाषा की लिपि गुरुमुखी और उर्दू भाषा की लिपि फारसी है।

मौखिक या उच्चरित भाषा को स्थायित्व प्रदान करने के लिए भाषा के लिखित रूप का विकास हुआ। प्रत्येक उच्चरित ध्वनि के लिए लिखित चिह्न या वर्ण बनाए गए। वर्णों की पूरी व्यवस्था को ही लिपि कहा जाता है। वस्तुतः लिपि उच्चरित ध्वनियों को लिखकर व्यक्त करने का एक ढंग है।

सभ्यता के विकास के साथ-साथ अपने भावों और विचारों को स्थायित्व प्रदान करने के लिए, दूर-सुदूर स्थित लोगों से संपर्क बनाए रखने के लिए तथा संदेशों और समाचारों के आदान-प्रदान के लिए जब मौखिक भाषा से काम न चल पाया होगा तब मौखिक ध्वनि संकेतों (प्रतीकों) को लिखित रूप देने की आवश्यकता अनुभव हुई होगी। यही आवश्यकता लिपि के विकास का कारण बनी होगी।

अनेक लिपियाँ :

किसी भी भाषा को एक से अधिक लिपियों में लिखा जा सकता है तो दूसरी ओर कई भाषाओं की एक ही लिपि हो सकती है अर्थात एक से अधिक भाषाओं को किसी एक लिपि में लिखा जा सकता है। उदाहरण के लिए हिंदी भाषा को हम देवनागरी तथा रोमन दोनों लिपियों में इस प्रकार लिख सकते हैं-

देवनागरी लिपि – मीरा घर गई है।
रोमन लिपि – meera ghar gayi hai.

इसके विपरीत हिंदी, मराठी, नेपाली, बोडो तथा संस्कृत सभी भाषाएँ देवनागरी लिपि में लिखी जाती हैं।
हिंदी जिस लिपि में लिखी जाती है उसका नाम ‘देवनागरी लिपि’ है। देवनागरी लिपि का विकास ब्राह्मी लिपि से हुआ है। ब्राह्मी वह प्राचीन लिपि है जिससे हिंदी की देवनागरी का ही नहीं गुजराती, बँगला, असमिया, उड़िया आदि भाषाओं की लिपियों का भी विकास हुआ है।

देवनागरी लिपि में बायीं ओर से दायीं ओर लिखा जाता है। यह एक वैज्ञानिक लिपि है। यह एक मात्र ऐसी लिपि है जिसमें स्वर तथा व्यंजन ध्वनियों को मिलाकर लिखे जाने की व्यवस्था है। संसार की समस्त भाषाओं में व्यंजनों का स्वतंत्र रूप में उच्चारण स्वर के साथ मिलाकर किया जाता है पर देवनागरी के अलावा विश्व में कोई भी ऐसी लिपि नहीं है जिसमें व्यंजन और स्वर को मिलाकर लिखे जाने की व्यवस्था हो। यही कारण है कि देवनागरी लिपि अन्य लिपियों की तुलना में अधिक वैज्ञानिक लिपि है।

अधिकांश भारतीय भाषाओं की लिपियाँ बायीं ओर से दायीं ओर ही लिखी जाती हैं। केवल उर्दू जो फारसी लिपि में लिखी जाती है दायीं ओर से बायीं ओर लिखी जाती है।

नीचे की तालिका में विश्व की कुछ भाषाओं और उनकी लिपियों के नाम दिए जा रहे हैं-

क्रम भाषा लिपियाँ
1 हिंदी, संस्कृत, मराठी, नेपाली, बोडो देवनागरी
2 अंग्रेजी, फ्रेंच, जर्मन, स्पेनिश, इटेलियन, पोलिश, मीजो रोमन
3 पंजाबी गुरुमुखी
4 उर्दू, अरबी, फारसी फारसी
5 रूसी, बुल्गेरियन, चेक, रोमानियन रूसी
6 बँगला बँगला
7 उड़िया उड़िया
8 असमिया असमिया

हिन्दी में लिपि चिह्न

देवनागरी के वर्णो में ग्यारह स्वर और इकतालीस व्यंजन हैं। व्यंजन के साथ स्वर का संयोग होने पर स्वर का जो रूप होता है, उसे मात्रा कहते हैं; जैसे-

अ आ इ ई उ ऊ ऋ ए ऐ ओ औ
ा ि ी ु ू ृ े ै ो ौ
क का कि की कु कू के कै को कौ

देवनागरी लिपि

देवनागरी लिपि एक वैज्ञानिक लिपि है। ‘हिन्दी’ और ‘संस्कृत’ देवनागरी लिपि में लिखी जाती हैं। ‘देवनागरी’ लिपि का विकास ‘ब्राही लिपि’ से हुआ, जिसका सर्वप्रथम प्रयोग गुजरात नरेश जयभट्ट के एक शिलालेख में मिलता है। 8वीं एवं 9वीं सदी में क्रमशः राष्ट्रकूट नरेशों तथा बड़ौदा के ध्रुवराज ने अपने देशों में इसका प्रयोग किया था। महाराष्ट्र में इसे ‘बालबोध’ के नाम से संबोधित किया गया।

विद्वानों का मानना है कि ब्राह्मी लिपि से देवनागरी का विकास सीधे-सीधे नहीं हुआ है, बल्कि यह उत्तर शैली की कुटिल, शारदा और प्राचीन देवनागरी के रूप में होता हुआ वर्तमान देवनागरी लिपि तक पहुँचा है। प्राचीन नागरी के दो रूप विकसित हुए- पश्चिमी तथा पूर्वी। इन दोनों रूपों से विभिन्न लिपियों का विकास इस प्रकार हुआ-

प्राचीन देवनागरी लिपि:

पश्चिमी प्राचीन देवनागरी- गुजराती, महाजनी, राजस्थानी, महाराष्ट्री, नागरी
पूर्वी प्राचीन देवनागरी- कैथी, मैथिली, नेवारी, उड़िया, बँगला, असमिया

संक्षेप में ब्राह्मी लिपि से वर्तमान देवनागरी लिपि तक के विकासक्रम को निम्नलिखित आरेख से समझा जा सकता है-
ब्राह्मी:

उत्तरी शैली- गुप्त लिपि, कुटिल लिपि, शारदा लिपि, प्राचीन नागरी लिपि
प्राचीन नागरी लिपि:
पूर्वी नागरी- मैथली, कैथी, नेवारी, बँगला, असमिया आदि।
पश्चिमी नागरी- गुजराती, राजस्थानी, महाराष्ट्री, महाजनी, नागरी या देवनागरी।

दक्षिणी शैली-

देवनागरी लिपि पर तीन भाषाओं का बड़ा महत्त्वपूर्ण प्रभाव पड़ा।

(i) फारसी प्रभाव : पहले देवनागरी लिपि में जिह्वामूलीय ध्वनियों को अंकित करने के चिह्न नहीं थे, जो बाद में फारसी से प्रभावित होकर विकसित हुए- क. ख. ग. ज. फ।

(ii) बांग्ला-प्रभाव : गोल-गोल लिखने की परम्परा बांग्ला लिपि के प्रभाव के कारण शुरू हुई।

(iii) रोमन-प्रभाव : इससे प्रभावित हो विभिन्न विराम-चिह्नों, जैसे- अल्प विराम, अर्द्ध विराम, प्रश्नसूचक चिह्न, विस्मयसूचक चिह्न, उद्धरण चिह्न एवं पूर्ण विराम में ‘खड़ी पाई’ की जगह ‘बिन्दु’ (Point) का प्रयोग होने लगा।

देवनागरी लिपि की विशेषताएँ

देवनागरी लिपि की निम्रांकित विशेषताएँ हैं-

(1) आ (ा), ई (ी), ओ (ो) और औ (ौ) की मात्राएँ व्यंजन के बाद जोड़ी जाती हैं (जैसे- का, की, को, कौ); इ (ि) की मात्रा व्यंजन के पहले, ए (े) और ऐ (ै) की मात्राएँ व्यंजन के ऊपर तथा उ (ु), ऊ (ू),
ऋ (ृ) मात्राएँ नीचे लगायी जाती हैं।

(2) ‘र’ व्यंजन में ‘उ’ और ‘ऊ’ मात्राएँ अन्य व्यंजनों की तरह न लगायी जाकर इस तरह लगायी जाती हैं-
र् +उ =रु । र् +ऊ =रू ।

(3)अनुस्वार (ां) और विसर्ग (:) क्रमशः स्वर के ऊपर या बाद में जोड़े जाते हैं;
जैसे- अ+ां =अं। क्+अं =कं। अ+:=अः। क्+अः=कः।

(4) स्वरों की मात्राओं तथा अनुस्वार एवं विसर्गसहित एक व्यंजन वर्ण में बारह रूप होते हैं। इन्हें परम्परा के अनुस्वार ‘बारहखड़ी’ कहते हैं।
जैसे- क का कि की कु कू के कै को कौ कं कः।
व्यंजन दो तरह से लिखे जाते हैं- खड़ी पाई के साथ और बिना खड़ी पाई के।

(5) ङ छ ट ठ ड ढ द र बिना खड़ी पाईवाले व्यंजन हैं और शेष व्यंजन (जैसे- क, ख, ग, घ, च इत्यादि) खड़ी पाईवाले व्यंजन हैं। सामान्यतः सभी वर्णो के सिरे पर एक-एक आड़ी रेखा रहती है, जो ध, झ और भ में कुछ तोड़ दी गयी है।

(6) जब दो या दो से अधिक व्यंजनों के बीच कोई स्वर नहीं रहता, तब दोनों के मेल से संयुक्त व्यंजन बन जाते हैं।
जैसे- क्+त् =क्त । त्+य् =त्य । क्+ल् =क्ल ।

(7) जब एक व्यंजन अपने समान अन्य व्यंजन से मिलता है, तब उसे ‘द्वित्व व्यंजन’ कहते हैं।
जैसे- क्क (चक्का), त्त (पत्ता), त्र (गत्रा), म्म (सम्मान) आदि।

(8) वर्गों की अंतिम ध्वनियाँ नासिक्य हैं।

(9) ह्रस्व एवं दीर्घ में स्वर बँटे हैं।

(10) उच्चारण एवं प्रयोग में समानता है।

(11) प्रत्येक वर्ग में अघोष फिर सघोष वर्ण हैं।

(12) छपाई एवं लिखाई दोनों समान हैं।

(13) निश्चित मात्राएँ हैं।

(14) प्रत्येक के लिए अलग लिपि चिह्न है।

(15) इसके ध्वनिक्रम पूर्णतया वैज्ञानिक हैं।

मातृभाषा

मातृभाषा- खनूर सिंह का जन्म पंजाबीभाषी परिवार में हुआ है, इसलिए वह पंजाबी बोलता है। साक्षी शर्मा का जन्म हिंदीभाषी परिवार में हुआ है, इसलिए वह हिंदी बोलती है। पंजाबी व हिंदी क्रमशः उनकी मातृभाषाएँ हैं।

इस प्रकार वह भाषा जिसे बालक अपने परिवार से अपनाता व सीखता है, मातृभाषा कहलाती है।

दूसरे शब्दों में- बालक जिस परिवार में जन्म लेता है, उस परिवार के सदस्यों द्वारा बोली जाने वाली भाषा वह सबसे पहले सीखता है। यही ‘मातृभाषा’ कहलाती है।

प्रादेशिक भाषा

प्रादेशिक भाषा- जब कोई भाषा एक प्रदेश में बोली जाती है तो उसे ‘प्रादेशिक भाषा’ कहते हैं।

अन्तर्राष्ट्रीय भाषा

अन्तर्राष्ट्रीय भाषा- जब कोई भाषा विश्व के दो या दो से अधिक राष्ट्रों द्वारा बोली जाती है तो वह अन्तर्राष्ट्रीय भाषा बन जाती है। जैसे- अंग्रेजी अन्तर्राष्ट्रीय भाषा है।

राजभाषा

राजभाषा- वह भाषा जो देश के कार्यालयों व राज-काज में प्रयोग की जाती है, राजभाषा कहलाती है।
जैसे- भारत की राजभाषा अंग्रेजी तथा हिंदी दोनों हैं। अमरीका की राजभाषा अंग्रेजी है।

मानक भाषा

मानक भाषा-विद्वानों व शिक्षाविदों द्वारा भाषा में एकरूपता लाने के लिए भाषा के जिस रूप को मान्यता दी जाती है, वह मानक भाषा कहलाती है।

भाषा में एक ही वर्ण या शब्द के एक से अधिक रूप प्रचलित हो सकते हैं। ऐसे में उनके किसी एक रूप को विद्वानों द्वारा मान्यता दे दी जाती है; जैसे-

गयी – गई (मानक रूप)
ठण्ड – ठंड (मानक रूप)
अन्त – अंत (मानक रूप)
रव – ख (मानक रूप)
शुद्ध – शुदध (मानक रूप)

हिन्दी भाषा

बहुत सारे विद्वानों का मत है कि हिन्दी भाषा संस्कृत से निष्पन्न है; परन्तु यह बात सत्य नहीं है। हिन्दी की उत्पत्ति अपभ्रंश भाषाओं से हुई है और अपभ्रंश की उत्पत्ति प्राकृत से। प्राकृत भाषा अपने पहले की पुरानी बोलचाल की संस्कृत से निकली है। स्पष्ट है कि हमारे आदिम आर्यों की भाषा पुरानी संस्कृत थी। उनके नमूने ऋग्वेद में दिखते हैं। उसका विकास होते-होते कई प्रकार की प्राकृत भाषाएँ पैदा हुई। हमारी विशुद्ध संस्कृत किसी पुरानी प्राकृत से ही परिमार्जित हुई है। प्राकृत भाषाओं के बाद अपभ्रशों और शौरसेनी अपभ्रंश से निकली है।

हिन्दी भाषा और उसका साहित्य किसी एक विभाग और उसके साहित्य के विकसित रूप नहीं हैं; वे अनेक विभाषाओं और उनके साहित्यों की समष्टि का प्रतिनिधित्व करते हैं। एक बहुत बड़े क्षेत्र- जिसे चिरकाल से मध्यदेश कहा जाता रहा है- की अनेक बोलियों के ताने-बाने से बुनी यही एक ऐसी आधुनिक भाषा है, जिसने अनजाने और अनौपचारिक रीति से देश की ऐसी व्यापक भाषा बनने का प्रयास किया था, जैसी संस्कृत रहती चली आई थी; किन्तु जिसे किसी नवीन भाषा के लिए अपना स्थान तो रिक्त करना ही था।

वर्तमान हिन्दी भाषा का क्षेत्र बड़ा ही व्यापक हो चला। है इसे निम्नलिखित विभागों में बाँटा गया हैं-
(क) बिहारी भाषा : बिहारी भाषा बँगला भाषा से अधिक संबंध रखती है। यह पूर्वी उपशाखा के अंतर्गत है और बँगला, उड़िया और आसामी की बहन लगती है। इसके अंतर्गत निम्न बोलियाँ हैं- मैथली, मगही, भोजपुरी, पूर्वी आदि। मैथली के प्रसिद्ध कवि विद्यापति ठाकुर और भोजपुरी के बहुत बड़े प्रचारक भिखारी ठाकुर हुए।

(ख) पूर्वी हिन्दी : अर्द्धमागधी प्राकृत के अप्रभ्रंश से पूर्वी हिन्दी निकली है। गोस्वामी तुलसीदास ने रामचरितमानस जैसे महाकाव्यों की रचना पूर्वी हिन्दी में ही की। दूसरी तीन बोलियाँ हैं- अवध, बघेली और छत्तीसगढ़ी। मलिक मोहम्मद जायसी ने अपनी प्रसिद्ध रचनाएँ इसी भाषा में लिखी हैं।

(ग) पश्चिमी हिन्दी : पूर्वी हिन्दी तो बाहरी और भीतरी दोनों शाखाओं की भाषाओं के मेल से बनी हैं; परन्तु पश्चिमी हिन्दी का संबंध भीतरी शाखा से है।

यह राजस्थानी, गुजराती और पंजाबी से संबंध रखती है। इस भाषा के कई भेद हैं- हिन्दुस्तानी, ब्रज, कनौजी, बुँदेली, बाँगरू और दक्षिणी।

गंगा-यमुना के बीच मध्यवर्ती प्रान्त में और दक्षिण दिल्ली से इटावे तक ब्रजभाषा बोली जाती है। गुड़गाँव और भरतपुर, करोली और ग्वालियर तक ब्रजभाषी हैं। इस भाषा के कवियों में सूरदास और बिहारीलाल ज्यादा चर्चित हुए।

कन्नौजी, ब्रजभाषा से बहुत कुछ मिलती-जुलती है। इटावा से इलाहाबाद तक इसके बोलनेवाले हैं। अवध के हरदोई और उन्नाव में यही भाषा बोली जाती है।

बुँदेली बुंदेलखंड की बोली है। झाँसी, जालौन, हमीरपुर और ग्वालियर के पूर्वी प्रान्त, मध्य प्रदेश के दमोह छत्तीसगढ़ के रायपुर, सिउनी, नरसिंहपुर आदि स्थानों की बोली बुँदेली है। छिंदवाड़ा और हुशंगाबाद के कुछ हिस्सों में भी इसका प्रचार है।

हिसार, झींद, रोहतक, करनाल आदि जिलों में बाँगरू भाषा बोली जाती है। दिल्ली के आसपास की भी यही भाषा है।

दक्षिण के मुसलमान जो हिन्दी बोलते हैं उसका नाम दक्षिणी हिन्दी है। इसके बोलनेवाले मुंबई, बरोदा, बरार, मध्य प्रदेश, कोचीन, कुग, हैदराबाद, चेन्नई, माइसोर और ट्रावनकोर तक फैले हैं। इन क्षेत्रों के लोग मुझे या मुझको की जगह ‘मेरे को’ बोलते हैं।

हिन्दुस्तानी भाषा के दो रूप हैं। एक तो वह जो पश्चिमी हिन्दी की शाखा है, दूसरी वह जो साहित्य में काम आती है। पहली गंगा-यमुना के बीच का जो भाग है उसके उत्तर में रुहेलखंड में और अम्बाला जिले के पूर्व में बोली जाती है। यह पश्चिमी हिन्दी की शाखा है। यही धीरे-धीरे पंजाबी में परिणत हुई। मेरठ के आस-पास और उसके कुछ उत्तर में यह भाषा अपने विशुद्ध रूप में बोली जाती है। वहाँ उसका वही रूप है, जिसके अनुसार हिन्दी का व्याकरण बना है। रुहेलखंड में यह धीरे-धीरे कन्नौजी में और अंबाले में पंजाबी में परिणत हो गई है। अर्थात हिन्दुस्तानी और कुछ नहीं, सिर्फ ऊपरी दोआब की स्वदेशी भाषा है। दिल्ली में मुसलमानों के सहयोग से हिन्दी भाषा का विकास बहुत बढ़ा।

वर्तमान समय में इस भाषा का प्रचार इतना बढ़ गया है कि कोई प्रान्त, सूबा या शहर ऐसा नहीं रह गया है जहाँ इसके बोलनेवाले न हों। बंगाली, मद्रासी, गुजराती, मराठी, नेपाली आदि भिन्न भाषाएँ हैं फिर भी ये भाषा-भाषी हिन्दी को समझ लेते हैं। इसका व्याकरण वैज्ञानिक है। इस भाषा में संस्कृत के अलावा फ्रेंच, जापानी, बर्मी, चीनी, अंग्रेजी, पुर्तगाली आदि अनेकानेक भाषाओं के शब्दों की भरमार है। अतएव, इस भाषा का फैलाव बहुत तेजी से हुआ है। यही कारण है कि आज यह राष्ट्रभाषा का दर्जा प्राप्त कर चुकी है।

स्मरणीय तथ्य
‘राजस्थानी हिन्दी’ का विकास ‘अपभ्रंश’ से हुआ।
‘पश्चिमी हिन्दी’ का विकास ‘शौरसेनी’ से हुआ।
‘पूर्वी हिन्दी’ का विकास ‘अर्द्धमागधी’ से हुआ।
‘बिहारी हिन्दी’ का विकास ‘मागधी’ से हुआ।
‘पहाड़ी हिन्दी’ का विकास ‘खस’ से हुआ।

भारत की भाषाओं की सूची

क्रं. सं. भाषाएँ बोलनेवालों का अनुपात % में
(1) संस्कृत 0.01
(2) मराठी 7.5
(3) नेपाली 0.3
(4) पंजाबी 2.8
(5) संथाली 0.6
(6) मलयालम 3.6
(7) मणिपुरी 0.2
(8) असमिया 1.6
(9) ओड़िया 3.4
(10) गुजराती 4.9
(11) कश्मीरी 0.5
(12) कन्नड़ 3.9
(13) डोगरी 0.2
(14) कोंकणी 0.2
(15) तमिल 6.3
(16) बांग्ला 8.3
(17) सिंधी 0.3
(18) उर्दू 5.2
(19) बोडो 0.1
(20) तेलुगू 7.9
(21) हिन्दी 40.2

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