स्त्रियों को शिक्षा की आवश्यकता

Women & Child

स्त्री शिक्षा स्त्री और शिक्षा को अनिवार्य रूप से जोड़ने वाली अवधारणा है। इसका एक रूप शिक्षा में स्त्रियों को पुरुषों की ही तरह शामिल करने से संबंधित है। दूसरे रूप में यह स्त्रियों के लिए बनाई गई विशेष शिक्षा पद्धति को संदर्भित करता है।


जातीय जीवन का विकास सामाजिक सुव्यवस्था और उसके श्रेष्ठ संस्कारों पर निर्भर है। भौतिक सम्पदायें और बाह्य-जीवन की सफलतायें मिलकर ही शान्ति व सुव्यवस्था स्थापित नहीं कर सकतीं। आन्तरिक स्वच्छता के अभाव में किसी भी देश जाति या संस्कृति में सुख, शान्ति की परिस्थितियाँ देर तक टिक नहीं सकतीं। ऊपर से बहुमूल्य वस्त्राभूषणों से अलंकृत हों और अंतर्मन दूषित विचारों की सडाँद से भर रहा हो तो कौन जाने कब कोई न कोई विग्रह उत्पन्न हो जाय?


समाज की अन्तः चेतना गृहस्थाश्रम को माना गया है। गृहस्थ का आधार-सूत्र स्त्री पुरुष की मिली जुली इकाई को मानते हैं। इस प्रकार जब कभी समाज संस्कार की आवश्यकता प्रतीत होती है तो समाज के इसी मूलाधार गृहस्थ-जीवन को ही अधिक दृढ़ सुसंस्कृत और सुव्यवस्थित बनाने की आवश्यकता प्रतीत होती है।


ब्रह्मचर्य और उत्तम चरित्र का निर्माण संस्कारवान् गृहस्थ-जीवन में होता है। कर्मशीलता, दृढ़ता और नैतिक जागृति भी—पारिवारिक सौमनस्यता पर अवलम्बित है। देश जाति और संस्कृति इसी से प्रभावित होते हैं। इन आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए पुरुष की जागृति मात्र पर्याप्त नहीं है। नारी की विशेषतायें भी उतनी ही अनिवार्य हैं। बाह्य-व्यवस्था और आन्तरिक सद्भाव मिलकर ही गृहस्थ जीवन को निर्मल पवित्र एवं उद्दात्त बनाते हैं। इसके लिए स्त्रियों के संस्कारवान् होने की भी उतनी ही आवश्यकता है जितनी पुरुष की।


आज की अनियन्त्रित अन्ध-परम्पराओं के कारण हमारे गृहस्थ जीवन में बड़ी गहराई तक कुसंस्कारों ने जड़ें जमा ली हैं। मनोबल की हीनता, चारित्रिक-पतन, भय, क्रोध, कलह और कटुता के कारण पारिवारिक जीवन बुरी तरह अस्त−व्यस्त हो चुका है। हमारी अविवेकपूर्ण परम्परायें ही इसकी जवाबदार हैं। स्त्री शिक्षा इनमें प्रमुख है। गृहस्थ की दुर्दशा का कारण आज नारियों की अशिक्षा ही है। ज्ञान के अभाव में उनका न तो बौद्धिक विकास हो पाता है न नैतिक। इसका प्रभाव सम्पूर्ण गृहस्थी पर पड़ता है। जहाँ सुख और शान्ति की निर्झरिणी प्रवाहित होनी चाहिए थी वहाँ नारकीय नैराश्य छाया रहता है। इस अन्धकार में जातीय-विकास की गाड़ी मुश्किल से आगे बढ़ पाती है।



पुरुष का सम्पूर्ण जीवन स्त्री पर आधारित रहता है। पुरुष की निर्माणकर्ती नारी है। उसके कल्याण-अकल्याण, ऊँच-नीच, सुख-दुःख, पतन और उत्थान का सम्पूर्ण भार स्त्री पर है। बच्चा जब जन्म लेता है उसके बाद किशोरावस्था में आने तक वह अधिकाँश माता के संसर्ग में ही रहता है। माता का अर्थ यहाँ उन सभी नारियों से होता है जो एक घर, एक आँगन में रहती हैं। इस बीच बालक में संस्कार पड़ते हैं। अच्छे या बुरे संस्कारों का अनुकरण वह अपनी समीपवर्ती माताओं से ही करता है। यदि स्त्रियों में श्रेष्ठ संस्कार न हुए तो बच्चे का स्वभाव भी मलिन बनने लगता है। इसलिये स्त्रियों को संस्कारवान् बनाने के लिए उनकी शिक्षा उपयोगी ही नहीं आवश्यक है, अनिवार्य है।


इस संबंध में आज का समाज अनेक तर्क व भ्रान्ति मूलक दुर्बल धारणायें बनाए बैठा है। लोगों की यह मान्यता है कि स्त्री शिक्षा से अनर्थ अनाचार और उपद्रव खड़े होते हैं और पढ़ी-लिखी स्त्रियों से संचालन, सन्तान पालन, भोजन व्यवस्था व पुरुषों की देख रेख नहीं हो पाती। इस प्रकार की आशंका प्रकट करने वाले व्यक्तियों का ध्यान हम संसार के प्रगतिशील देशों की ओर ले जाना चाहते हैं। अमेरिका, ब्रिटेन, कनाडा, फ्राँस, आस्ट्रेलिया, रूस, जापान, देशों की उन्नति का अधिकाँश श्रेय वहाँ की नारी शिक्षा को ही है। क्या कोई कह सकता है कि उनके बच्चों का लालन पालन ठीक प्रकार नहीं होता? क्या वहाँ के पुरुषों की प्रगति रुकी है?



सच बात तो यह है बौद्धिक विकास के अभाव में हमारी मातायें न तो ठीक प्रकार बच्चों का लालन-पालन कर पाती हैं न पतियों की समुचित व्यवस्था। घर के कामों में कोई भी फूहड़पन देखा जा सकता है। पर्दे के अन्दर घुटती हुई नारियों को यह भी पता नहीं होता कि मानव-जीवन की समस्यायें क्या हैं? और उन्हें किस प्रकार सुलझाया जा सकता है? अशिक्षित पति-पत्नी तो किसी प्रकार रोते झींकते गृहस्थ की गाड़ी धकेलते रहते हैं।


एक अशान्ति एवं अतृप्ति आज हर सद्गृहस्थ अनुभव कर रहा है। किसी को भी पारिवारिक-जीवन में सुख व चैन नहीं मिल पा रहा है। इसका एक ही कारण है कि हमारी बेटियों को खुले वातावरण में रहकर बौद्धिक विकास नहीं करने दिया जाता। कुँए के मेंढक की तरह बेचारी जेवर, कपड़ों, चूल्हे-चौके तक ही सीमित रह जाती है। दुर्भाग्य से यदि किसी को वैधव्य मिल गया तब तो उसकी यन्त्रणाओं की सीमा ही टूट जाती है। अपने हाथों कमाकर खा सकने जितनी शक्ति भी नहीं रहने दी, इस अभागिन अशिक्षा ने। फिर भी हम हैं जो इस आवश्यकता को समझ नहीं पा रहे और स्त्री-शिक्षा से मुँह छिपाये बैठे हैं।



स्त्रियाँ अपने आवश्यक कर्तव्यों का पालन करते हुए भी अपनी रुचि, इच्छा-शक्ति और सुविधानुसार साहित्य, संगीत गृह-कला और कला-कौशल का ज्ञान प्राप्त करके गृहस्थ-जीवन को समुन्नत बना सकती हैं। मानसिक और नैतिक शक्ति के विकास से मनुष्य-जीवन को सफल बनाने में अपना अमूल्य सहयोग दे सकती हैं। जिस स्त्री को बौद्धिक विकास करने का अवकाश न मिला हो उसके व्यवहार में कभी सरसता न आ सकेगी। हम जिस अभिव्यक्ति की उनसे कामना करते हैं यह शिक्षा की कमी के कारण वे दे नहीं पायेंगी और गृहस्थ-जीवन शुष्क नीरस एवं निष्प्राण ही बना रहेगा।


यह सरसता प्राप्त करने के लिए और स्त्रियों को अपना दायित्व कुशलतापूर्वक निभाते रहने देने के लिए उनको स्वावलम्बी बनाना आवश्यक है। अशिक्षा के कारण वे गृहस्थी की उन्नति न कर पायेंगी। केवल कठपुतली की भाँति पुरुष की दासी बनी हुई दासी जैसे कर्तव्यों का ही निर्वाह कर सकती हैं। जिस स्नेह प्रेम, आत्मीयता सरसता की उससे अपेक्षा की गई थी उसे वह बेचारी कहाँ से दे पायेगी।


भारतीय संस्कृति का संगठन ऋषियों ने इस प्रकार किया है कि इसमें स्त्री शिक्षा से किञ्चित मात्र हानि की आशंका नहीं। यदि पुरुष अपना कर्तव्य उचित रीति से चलाते रहें तो जिस स्त्री शिक्षा को स्वच्छन्द बनाने वाली या ऑफिसों की ओर दौड़ने वाली अर्थकारी विद्या मानते हैं वह वैसी सचमुच में सिद्ध न हो।



जो शिक्षा पुरुष में मानसिक, नैतिक और आध्यात्मिक गुणों का प्रकाश करती है उससे स्त्रियों के भी मन और हृदय उन्नत और विशाल बनते हैं। इससे वह पुरुष को विवेकवान बनाती है। उसकी महानता बढ़ाकर पुरुषार्थ जगाती है। गृह व्यवस्था, सन्तान पालन का कार्य और भी बुद्धिमत्तापूर्ण चला पाने की क्षमता उसे मिलती है, जिससे सुख सन्तोष और शान्ति की परिस्थितियाँ बढ़ती हैं। शिक्षित नारियाँ हर प्रकार पुरुषों को सहयोग दे सकती हैं।


गृहस्थ-जीवन की दुर्दशा सुधारने के लिये स्त्री को, शिक्षित बनाने में तनिक भी देर नहीं की जानी चाहिये, यद्यपि एक लंबी पराधीनता के बाद आज हमारी संस्कृति में नयी चेतना का सञ्चार हुआ है। यह प्रसन्नता की ही बात है कि अब लोग जीवन के प्रत्येक पहलू पर सही सोचने लगे हैं। अब नारी-शिक्षा की भ्रान्त धारणाओं का अन्त हो चला है और इसे सामाजिक-शक्ति का आधार माना जाने लगा है। जातीय जीवन के जीर्णोद्धार के लिए हमें स्त्री शिक्षा के शुभ-कार्य को पूर्ण उत्साह लगन व तत्परता के साथ आगे बढ़ाना चाहिए। हमारे सामाजिक एवं पारिवारिक जीवन में सुख और शान्ति की हरियाली इसी प्रयत्न के आधार पर लहलहाती दिखाई पड़ने लगेगी।



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