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लोगों की हत्या कराने वाला युगांडा का तानाशाह खाता था इंसानी मांस – BKUT

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युगांडा का तानाशाह ईदी अमीन ने 8 वर्ष तक राष्ट्रपति के तौर पर राज किया और लोगों पर इतने जुल्म किये कि सुनने वालों की रूह भी कांप जाये।

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नई दिल्‍ली (जागरण स्‍पेशल)। भारतीय प्रधानमंत्री इन दिनों अफ्रीकी देशों की यात्रा पर गए हुए हैं। इनमें युगांडा, रवांडा और दक्षिण अफ्रीका का नाम शामिल है। ये देश भले ही छोटे हैं लेकिन इनकी अपनी खास अहमियत है। बहरहाल, हम आपको पीएम मोदी की यात्रा में शामिल होने वाले युगांडा के एक ऐसे तानाशाह की बात बता रहे हैं जो अपनी क्रूरता की वजह पूरी दुनिया में चर्चा का विषय बना था। इसकी क्रूरता की कहानियों से आपकी भी रूह कांप जाएगी। युगांडा का तानाशाह ईदी अमीन को बेहद क्रूर शासक के तौर पर याद किया जाता है। इस शख्स ने 8 वर्ष तक राष्ट्रपति के तौर पर राज किया और लोगों पर इतने जुल्म किये कि सुनने वालों की रूह भी कांप जाये। सिर्फ इतना ही नही इस शख्स ने अपने पूरे शासन काल में करीब 6 लाख लोगों को मौत के घाट उतरवाया। ये शख्स इतना क्रूर था कि इंसानों का मांस भी खा जाता था। इसके फ्रिज में इंसानों के कटे हुए सिर और अन्य अंग भी बरामद हुए थे। अपनी इसी क्रूरता के कारण ही इसे ‘मैड मैन ऑफ अफ्रीका’ भी कहा जाता है।


खूबसूरत लड़कियों को बनाता था शिकार
इस शख्स ने क्रूरता की सभी हदें पार करते हुए हर खूबसूरत लड़की को अपनी हवस का शिकार बनाया। ये लोगों की हत्या किसी हथियार से नही करता था बल्कि उन्हें मारने के लिये जिंदा ही जमीन में गड़वा देता था या फिर भूखे मगरमच्छों को खिला देता था। 1979 में तंजानिया और अमीन विरोधी युगांडा सेना ने अमीन के शासन को जड़ से उखाड़ फेंका। इसके बाद अमीन सऊदी अरब आ गया, जहां साल 2003 में उसकी मौत हो गई। लेकिन आज भी इसकी क्रूरता की कहानियां सुन लोग सहम जाते हैं।


युगांडा का सैन्‍य तानाशाह और राष्‍ट्रपति
1971 से 1979 तक युगांडा का सैन्य नेता एवं राष्ट्रपति था। 1946 में अमीन ब्रिटिश औपनिवेशिक रेजिमेंट किंग्स अफ्रीका राइफल्स में शामिल हुआ।1962 में ग्रेट ब्रिटेन से युगांडा को आजादी मिलने के बाद, अमीन को कैप्टन तथा फिर 1963 में मेजर के पद पर पदोन्नत किया गया। अगले वर्ष, उसे सेना के उप कमांडर पद पर नियुक्त किया गया।


सत्‍ता तक पहुंचने की साजिश
1965 में प्रधानमंत्री मिल्टन ओबोटे और अमीन जायरे से युगांडा में हाथी दांत तथा सोने की तस्करी के एक सौदे में फंस गए थे। एक पूर्व कांगो नेता पैट्रिस लुमुम्बा के सहयोगी जनरल निकोलस ओलेंगा ने बाद में आरोप लगाया कि यह सौदा कांगो सेना के खिलाफ लड़ने वाले विद्रोहियों को गुप्त रूप से हथियारों की मदद पहुंचाने के लिए अमीन द्वारा उन तक तस्करी द्वारा हाथी दांत और सोना पहुंचाने की रणनीति का एक हिस्सा था। 1966 में युगांडा की संसद ने इसकी जांच करने की मांग की। ओबोटे ने औपचारिक राष्ट्रपति पद पर काबिज बुगांडा के कबाका (राजा) एडवर्ड मुटेसा को हटा कर एक नया संविधान लागू किया और स्वयं को कार्यकारी राष्ट्रपति घोषित कर दिया। उसने अमीन को कर्नल और आर्मी कमांडर के पद पर नियुक्त किया। अमीन ने कबाका के महल पर हुए एक हमले का नेतृत्व किया और मुटेसा को ब्रिटेन में निर्वासित जीवन जीने के लिए मजबूर कर दिया, जहां वह 1969 में अपनी मृत्यु तक रहते रहे।


सत्‍ता पर काबिज
25 जनवरी 1971 को, जब ओबोटे सिंगापुर में एक राष्ट्रमंडल शिखर सम्मलेन में भाग लेने गया था, एक सैन्य तख्तापलट कार्रवाई द्वारा अमीन ने सत्ता पर कब्‍जा कर लिया। अमीन के वफादार सैनिकों ने युगांडा में घुसने के मुख्य रास्ते एंटेब्बे अंतर्राष्ट्रीय हवाई अड्डे को सील कर दिया तथा कंपाला पर कब्‍जा कर लिया। सैनिकों ने ओबोटे के निवास को घेर लिया और प्रमुख मार्गों को अवरुद्ध कर दिया। रेडियो युगांडा के एक प्रसारण में ओबोटे की सरकार पर भ्रष्टाचार तथा लांगो क्षेत्र में विशेष व्यवहार का आरोप लगाया गया। रेडियो प्रसारण के बाद कंपाला की गलियों में भीड़ में उत्साह होने की खबरे मिलीं। अमीन ने घोषणा की कि वह राजनीतिज्ञ की बजाए एक सैनिक था और यह कि सैन्य सरकार एक कामचलाऊ सरकार के रूप में तब तक बनी रहेगी जब तक कि नए चुनावों की घोषणा नहीं हो जाती और यह घोषणा स्थिति के सामान्य होने के बाद होगी। उसने सभी राजनीतिक बंदियों को छोड़ने का वादा किया। देश के प्रमुख पद पर आसीन रहते हुए उसने स्वयं को फील्ड मार्शल के रूप में पदोन्नत कर लिया था।


आर्थिक कुप्रबंधन के लिए जाना जाता था अमीन
अमीन के शासन को मानव अधिकारों के दुरूपयोग, राजनीतिक दमन, जातीय उत्पीड़न, गैर कानूनी हत्याओं, पक्षपात, भ्रष्टाचार और सकल आर्थिक कुप्रबंधन के लिए जाना जाता था। अंतर्राष्ट्रीय प्रेक्षकों और मानव अधिकार समूहों का अनुमान है कि उसके शासन में 1,00,000 से 5,00,000 लोग मार डाले गए। अपने शासन काल में, अमीन को लीबिया के मुअम्मर अल-गद्दाफी के अतिरिक्त सोवियत संघ तथा पूर्वी जर्मनी का भी समर्थन हासिल था।


खुद को दी उपाधि
1975-1976 में अमीन, अफ्रीकी एकता संगठन का अध्यक्ष बन गया। इस संगठन को अफ्रीकी राज्यों की एकता को बढ़ावा देने के लिए बनाया गया था। 1977-1979 की अवधि के दौरान युगांडा को मानव अधिकारों के लिए संयुक्त राष्ट्र आयोग द्वारा तलब किया गया था। 1977 से 1979 तक अमीन ने स्वयं को “महामहिम, आजीवन राष्ट्रपति, फील्ड मार्शल अल हदजी डॉक्टर, ईदी अमीन दादा, वीसी, डीएसओ, एमसी, अफ्रीका व विशेष रूप से युगांडा में ब्रिटिश साम्राज्य का विजेता की उपाधि दी थी।


बेहतरीन एथलीट
ब्रिटिश और युगांडा की दोनों सेनाओं में अपने कार्यकाल के दौरान अमीन एक सक्रिय एथलीट था। 193 सेमी (6 फीट 4 इंच) की लंबाई और शक्तिशाली शरीर की वजह से 1951 से 1960 तक युगांडा का लाइट हैवीवेट बॉक्सिंग चैम्पियन होने के साथ-साथ वह तैराक भी था। ईदी अमीन एक खतरनाक रग्बी फॉरवर्ड भी था, हालांकि एक अधिकारी ने उसके बारे में कहा था कि ईदी अमीन एक शानदार और अच्छा खिलाड़ी है, लेकिन उसे सिखाना कठिन है और एक अक्षर का शब्द भी उसे विस्तार से समझाना पड़ता है।




पतन का कारण
युगांडा के भीतर असंतोष और 1978 में तंजानिया के कंगेरा प्रांत को जीतने का प्रयास युगांडा-तंजानिया युद्ध उसके शासन के पतन का कारण बना। अमीन बाद में लीबिया तथा सउदी अरब में निर्वासित जीवन जीने लगा, जहां 16 अगस्त 2003 को उसकी मृत्यु हो गई। युगांडा के इस जनरल ने घोषणा की कि एशियाई मूल से जुड़े सभी युगांडा के नागरिकों को या तो देश छोड़ने के लिए मजबूर किया जायेगा या फिर उन्हें संभावित रूप से अपनी जान से हाथ धोना पड़ेगा. 1972 और 1973 के बीच, युगांडा के 7000 एशियाई कनाडा आए थे। अमीन ने कभी भी अपनी आत्मकथा नहीं लिखी और न ही उसने किसी को आधिकारिक रूप से अपने जीवन के बारे में लिखने के लिए अधिकृत किया। अतः इस बारे में मतभेद हैं कि उसका जन्म कब तथा कहां हुआ था। अधिकांश जीवनी लेखकों का कहना है कि उसका जन्म 1925 के आसपास कोबोको या फिर कंपाला में हुआ था।